बात-बे-बात

बात-बे-बात रूठ जाना उसका,
बात-बे-बात मान जाना मेरा।
इसी नोकझोंक में उम्र बीती,
प्रेम का यह अनोखा बसेरा।

बात-बे-बात चाय का कप थमाना,
बात-बे-बात नजरें चुराना।
कहने को कुछ नहीं होता जब भी,
आँखें ही सब कुछ कह जाना।

बात-बे-बात यादों का आना,
बात-बे-बात दिल का दुखाना।
पुराने खतों की खुशबू में जैसे,
बीता हुआ कल फिर लौट आना।

बात-बे-बात हँसी का फूटना,
बात-बे-बात सावन का टूटना।
जिंदगी की किताब के पन्नों पर,
छोटी छोटी बातों का छूटना।

बात-बे-बात शिकवे गिले सारे,
बात-बे-बात लगते हैं प्यारे।
रिश्तों की डोर है इतनी नाजुक,
बात-बे-बात ही टूटें, बात-बे-बात ही सँवारे।

तो चलो आज फिर बात करें,
बात-बे-बात मुलाकात करें।
क्योंकि जिंदगी है चार दिन की,
बातों में ही सारी रात करें।

-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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