बात-बे-बात रूठ रहे हैं, कैसा यह व्यवहार,
छोटी-छोटी बातों पर ही, टूट रहे हैं प्यार।
बात-बे-बात ताने देना, बन बैठा है चलन,
शब्दों के विष-बाणों से अब, घायल होता मन।
बात-बे-बात क्रोध उमड़ता, धैर्य हुआ लाचार,
अहंकार की आँधी ने फिर, उजड़े कितने द्वार।
बात-बे-बात दोष गिनाना, कैसी रीति निभाई?
अपने मन की मैल न देखी, जग की भूल दिखाई।
बात-बे-बात यदि मुस्काएँ, प्रेमिल वचन सुनाएँ,
सूखे मन के उपवन में भी, खुशियों के फूल खिलाएं।
आओ अब संकल्प करें हम, इतना रखें विवेक,
बात-बे-बात न दुःख देंगे हम, यही मनुज का धर्म नेक।
बात-बे-बात कटुता छोड़ें, अपनाएँ सद्भाव,
मीठी वाणी से ही सजता, जीवन का स्वभाव।
-डॉ संगीता बिंदल
