अपराधबोध

   डॉक्टर सेन के अस्पताल में हमेशा मरीजों की लाईन लगी रही थी। वे शहर के अच्छे डॉ॰ थे। एक दिन एक मरीज बहुत गंभीर हालत में उनके पास आया उसके पास इलाज के लिए पैसे ज़्यादा नहीं थे, डॉ॰ सेन ने मरीज की हालत देखते ही उसका इलाज शुरू किया मगर पैसे नहीं होने के कारण उन्होंने उसे सरकारी अस्पताल जाने को कह दिया । 

          मरीज को सरकारी अस्पताल में भर्ती करता गया पर उसका वाहन ठीक तरह से इलाज नहीं पा रहा था क्योंकि शहर छोटा था और सरकारी अस्पताल में अच्छे डॉ॰ नहीं थे। मरीज को दुबारा घर वाले लेकर पहुँचे फिर रिसेप्शनिस्ट ने कह दिया पहले पैसे जमा करो फिर ही इलाज शुरू हो पाएगा। पर उनके पास तो इतने पैसे थे निधि, इन्ही सब में मरीज की हालत और बिगड़ी चली जा रही थी। मरीज को दूसरे शहर ले जाने का रिस्क भी, घर वाले नहीं उठाना चाह रहे थे। 

          डॉ॰ सेन शाम होते ही अस्पताल से घर चले जाते हैं बार बार उस मरीज के लिए उन्हें फ़ोन आता है पर वो उसे मना कर देते हैं । आख़िर मरीज़ की पत्नी अपने छोटे से बेटे को गोद में लिए उनके घर पहुँच जाती है। दरवाज़े की घंटी बजती है, दरवाज़ा डॉ॰ सेन ही खोलते हैं। उन्हें देखते ही महिला डॉक्टर के पैरों में गिर जाती है, उनके पैर पकड़ कर उनसे विनती करती है और अपने गले पहने हुए मंगलसूत्र को, उनके चरणों में रख कर कहती है, साहब मेरे पति को बचा लो, बाकी पैसे मैं धीरे धीरे चुका दूँगी मैं कल घर गिरवी रख दूँगी, पर अभी तो आप इतना रख लो। रोते रोते वो बस उनसे विनती करती है। 

     भीतर से उनकी पत्नी ये सब सुन रही थीं, बाहर आकर वो उस महिला को उठाती जैन और उसे पानी पिलाकर जाने को कहती हैं। महिला चली जाती है। 

     ये क्या निखिल तुम इतने बेरहम कब से हो गए, एक डॉ॰ का पहला फ़र्ज़ मरीज को देखना है । तुम कबसे पैसे के पीछे भागने लगे, अगर एक मरीज़ से पैसे कम ले लिए तो क्या? क्या मरीज की जान से ज़्यादा कीमती पैसा है!  तुम ऐसे न थे?  

       डॉ॰ सेन अपराधबोध से भर जाए हैं उन्हें अपने आप से ग्लानी महसूस होने लगती है, बिन कुछ कहे सीधे फ़ोन लगाते हैं और कहते हैं मरीज को भर्ती करो और ओ टी रेडी करो डॉक्टर्स को इन्फॉर्म करो उस मरीज तुरंत ऑपरेशन करना है, पर सर… उधर से आवाज आती है! मैंने जो कहा वो तुरंत करो मैं बस आ रहा हूँ!

        निखिल ने सपना को गले लगाया आज तुमने मेरी आँखें खोल दी सपना। अगर उस मरीज को कुछ हो जाता तो मैं जिंदगी भर इसी अपराधबोध के साथ जीता कि मेरे कारण उस मरीज की जान चली गई, थैंक्यू, थैंक्यू सो मच मेरी जान।इतना कहकर महिला का मंगलसूत्र हाथ में उठा डॉक्टर सेन अस्पताल की और चल पड़ते हैं। 

      ओ टी से बाहर आकर उस महिला के हाथ में उसका मंगलसूत्र दे कर उसे कहते हैं इसकी कोई आवश्यकता नहीं, आपने पति अब खतरे से बाहर हैं। और हाँ अब किसी फ़ीस की भी ज़रूरत नहीं हैं।

-अदिति रूसिया
वारासिवनी

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