अपराध-बोध

सुनंदा सारे घर में हैरान परेशान सी घूम रही थी,,घर के सारे सामान को उलट पुलट करती,तकिये,रजाई,गद्दों के निचे ढूंढ ढूंढ़ कर थक चुकी थी।उसकी डिजाइनर चेन जो उसने जयपुर से बहुत शौक से खरीदी थी -कहीं खो गई थी। बहुत कीमती तो नहीं थी लेकिन मोतियों,पत्थरों से बहुत सुंदर काम किया हुआ था जो उसकी बेटी प्रिया को भी बहुत पसंद था।उसके बार बार मांगने पर भी सुनंदा दे न सकी थी।”बच्चों को सोने के गहने नहीं” कहकर।
अपना मनपसंद गहना वह संभल कर अपनी आँखों के सामने ड्रेसिंग टेबल पर ही रखती थी यद्यपि उसके मन में अपनी नौकरानी पूजा के प्रति शंका तो हो रही थी लेकिन बिना किसी सुबूत उससे पूछ भी तो नहीं सकती थी,–हाँ ,कई बार पूजा को ड्रेसिंग टेबल पर राखी चेन को उठकर निहारते हुए उसे देखा जरूर था। शीशे में खुद को निहार वह कितनी खुश हो जाती थी,सुनंदा से भी यह बात छिपी नहीं थी,-”मैडम!,,यह हार? कितने का है? हम भी खरीदेगा”उस मासूम आदिवासी बालिका की चाहत उसे पाने की आकांक्षा उसकी आँखों से साफ साफ झलकती थी और यही बात उसे शक के घेरे में भी डाल रही थी।
बहुत परेशान और निराश होकर सुनंदा ने आख़िरकार पूछ ही लिया –”पूजा,तुमने मेरी चेन कहीं देखी है? –”नहीं तो” साधारण सा जवाब देकर वह अपने काम में व्यस्त हो गई। उसकी उपेक्षा देखकर सुनंदा का पारा चढ़ गया कुछ तेज आवाज में बोल पड़ी -”झूठ मत बोलो,,तुम बार बार उसे उठाकर नहीं देखती थी? उसे खरीदने की बात कर रही थी, आखिर मौका देखकर चुरा ही लिया न ?’ ‘पूजा की आँखों में मोटे मोटे आंसू छलक उठे,–”नहीं मैडम, हमने नहीं चुराया आपने ही कहीं और रख दिया होगा ” वह बैचैन थी अपने ऊपर चोरी का आरोप सुनकर। सुनंदा उसे डांटती रही -चेन वापस करने को कहती रही लेकिन पूजा सिर्फ रोती जा रही थी। दूसरे दिन पूजा नहीं आई ,,,सुनंदा निराश थी ,,परसों उसकी बेटी हास्टल चली गई थी और इस चोरी की उलझन में वह उसे फोन भी नहीं कर सकी। विपिन जब प्रिया को हास्टल पहुंचाकर लौटेंगे तो वह क्या जवाब देगी? उसने बेमन से चाय बनाकर पी और मायूस हो सोफे पर बैठ गई थी तभी उसका मोबाईल बज उठा-प्रिया ने व्हाट्स एप पर अपनी तस्वीर भेजी थी जो उसने वार्षिक समारोह में खींची थी ,उसके गले में वही सुंदर सी चेन चमचमा रही थी जो सुनंदा ने जयपुर से खरीदी थी जो चोरी हो गई थी साथ में सन्देश भी था –सॉरी मम्मी ,अपने फंक्शन में पहनने की चाहत में आपसे बिना पूछे आपकी चेन ले आई थी,-पापा से भेज रही हूँ, प्रिया”- सुनंदा को तो मानो काठ मार गया था,वह स्तब्ध थी ।मासूम पूजा का निर्दोष चेहरा बार बार उसकी आ खों के सामने आ रहा था, पूजा सच्ची थी,उसके आगे वह बौनी साबित हो गई थी ।गरीब होना चोर या बेईमान होना नहीं होता सुनंदा अब पछता रही थी,-यह उसने क्या कर दिया? एक अपराध-बोध से वह खुद को लज्जित महसूस कर रही थी।अचानक मन में एक निश्चय किया बाजार जाकर वैसी ही एक सुंदर सी चेन का पूरा सेट ख़रीदा उसे पैक कर पूजा के घर चल दी। वह बीमार हो गई थी और बाहर ही धूप में लेटी हुई थी। सुनंदा को देख कर उठ खड़ी हुई-
”पूजा! तू मेरी बेटी जैसी है मुझे माफ़ कर दे,घर चल चेन प्रिया ले गई थी, मैं तुझसे माफ़ी मांगती हूँ,”पूजा के हाथों में वह उपहार देकर वह अब निश्चिन्त थी,
पाप का बोझ उतर गया था,लेकिन अपनी भूल का अपराध-बोध शायद जीवन भर रहेगा।

-पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर

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