वो भी क्या दिन थे,जब सखी सहेली हमदम थे।
प्यारी सहेलियों के संग, कहकहे लगाया करते थे,
किसी बात की चिंता नहीं बेफिक्र होकर रहते थे,
आया सावन का महीना, बारिश में भीगा करते थे,
कागज की नाव भी खूब बना,पानी में तैराया करते थे,
मानसून के नए रंग का, खूब मजा संग लेते थे।
भैया की कलाई के लिए, राखियां बनाया करते थे।।
गर्मी आई छुट्टी लाई, दिन भर मस्ती भी करते थे,
पीपल के टूटे पत्तों से,ताले चाबी बन जाया करते थे,
कागज के नोट भी खूब बना, बाजार सजाया करते थे,
और तीन लोग भी एक साथ, कॉमिक्स मजे से पढ़ते थे।
मंदिर पिकनिक फिल्म देखने, सब संग में जाया करते थे,
बिन साइकिल बिन लूना के, पैदल ही चले जाया करते थे।।
सब सखियों के संग में, हिंडोला झूला करते थे, केसर टेशू के रंगों से, होली भी खेला करते थे।।
वो भी क्या दिन थे,जब सखी सहेली हमदम थे।।
-साधना छिरोल्या
दमोह (मध्यप्रदेश)
