कभी किसी का कंधे पर रखा हाथ,
जमाने भर का दर्द पिघला देता है,
अनायास गले लगाना किसी का सदियों से जमी बर्फ की दीवारें ढा देता है,
जरूरी नहीं शब्दों का गहरा संवाद हो,
मन से मन का अदृश्य पुल,
सारे शिकवे मिटा देता है,
आंखें बोलती है
देह कहती-सुनती है
शरीर की भाषा भाव के जरिए सीधे रूह तक पहुंचती है,
मौन बोलता है!
आवाज का मौन,
भीतर के द्वार खोलता है!
नेह की भीगी रेत पर
भावनाओं का ज्वार बहता है,
भावनाएं शब्दों की मोहताज नहीं होती,
वे किसी की आत्मीय मौजूदगी में हाव-भाव से सहज ही प्रकट होती हैं!
नहीं दिखता कोई अन्य माध्यम, बस भावनाएं पहुंच जाती है वहां जहां शब्दों का संसार मूक दृष्टा होता है, भाव प्रबल !
-नमिता दुबे मिशा
