मौन की भाषा में ही छिपी,
प्रेम की परिभाषा होती है।
शब्दों की मोहताज नहीं,
नैनो से अभिलाषा होती है
आँखों का पानी कह देता है,
जो होंठ कभी बोल न पाए।
काँपते हाथ थाम लेना,
हज़ार लफ़्ज़ों पर भारी जाए।
माँ की थाली पर रोटी रखना,
बिना कहे ‘खा ले बेटा’ बोलती है।
पिता का दरवाज़े तक आना,
बिन बोले ही दुआएँ खोलती है।
दोस्त का कंधे पर हाथ रखना,
‘मैं हूँ ना’ का ऐलान होता है।
प्रेमी की चुप्पी में भी,
पूरा का पूरा जहान होता है।
सूखे पत्ते का गिरना,
पेड़ का दर्द सुना जाता है।
दीये का आख़िरी टिमटिमाना,
अँधेरे से लड़ना सिखा जाता है।
शब्द तो बस कपड़े हैं,
भावना असली देह होती है।
मौन भी जब गले लगा ले,
तो सबसे बड़ी स्नेह होती है।
इसलिए मत तौलो हर बार,
रिश्तों को बोलों के तराजू में।
कुछ रिश्ते यूँ ही पलते हैं,
सिर्फ़ अहसास के घेराजू में।
क्योंकि भावनाएँ शब्दों की,
कभी मोहताज नहीं होती।
जहाँ दिल मिल जाएँ सच में,
वहाँ आवाज़ की प्यास नहीं होती।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
