“समय का अभाव या प्राथमिकताओं का संकट?”

“समय नहीं है” यह रोना आज हर गली-मोहल्ले में सुनाई देता है। मजदूर से मालिक तक, छात्र से शिक्षक तक, सबके पास एक ही शिकायत दिन छोटा पड़ गया है।

पर रुकिए। घड़ी की सुइयाँ तो उतनी ही रफ्तार से चल रही हैं जितनी शिवाजी के समय चलती थीं, जितनी भगत सिंह के समय चलती थीं। फिर समय कहाँ गायब हो गया?

सोचिये, भारत के ३ प्रतिशत लोगों ने बाकी ९७ प्रतिशत को गुलाम बना रखा है तो समय कहाँ से मिलेगा?

जब देश की ७०% दौलत सिर्फ ३% हाथों में सिमट जाए, जब नीतियाँ ऐसी बनें कि किसान सुबह ४ बजे उठकर भी कर्ज में डूबा रहे, जब नौजवान डिग्री लेकर भी १२-१२ घंटे १५ हजार की नौकरी में खटने को मजबूर हो, तो वह समय लाएगा कहाँ से?

उसके पास समय नहीं है क्योंकि उसका समय निचोड़ा जा रहा है। उसका दिन इसलिए छोटा है क्योंकि उसकी मेहनत का बड़ा हिस्सा कोई और खा रहा है। सुबह फैक्ट्री, दोपहर ओवरटाइम, शाम को साइड का काम — जब जीने की जद्दोजहद ही पूरी जिंदगी बन जाए, तो किताब पढ़ने का, बच्चों से खेलने का, माँ-बाप के पास बैठने का समय बचेगा कैसे?

यह गुलामी जंजीरों वाली नहीं है भैया, यह ईएमआई वाली गुलामी है। यह कोड़ों वाली नहीं है, यह टारगेट वाली गुलामी है। पहले अंग्रेज लगान वसूलते थे, अब कॉरपोरेट आपका पसीना वसूलता है। पहले राजा का हुक्म था, अब बॉस का मेल है। नाम बदला है, काम वही है — ९७ प्रतिशत का समय निचोड़कर ३ प्रतिशत की तिजोरी भरना।

और हम? हम उसी टूटे हुए समय में से भी इंस्टाग्राम पर घंटा बर्बाद कर देते हैं। क्योंकि जब दिनभर किसी और के सपने के लिए खटा जाता है, तो रात को अपने दिमाग को सुन्न करना ही सुकून लगता है। रील देखना मजबूरी बन जाता है, किताब पढ़ना विलासिता।

तो यह केवल प्राथमिकताओं का संकट नहीं है। यह पहले व्यवस्था का संकट है, फिर प्राथमिकता का। अर्जुन को युद्ध के मैदान में भी गीता सुनने का समय मिला, क्योंकि वह गुलाम नहीं था। बुद्ध को राज-पाट छोड़ने का समय मिला, क्योंकि उसके पास चुनने का अधिकार था।

जिस दिन ९७ प्रतिशत यह समझ जाएंगे कि उनका समय छीना जा रहा है, उस दिन शिकायत बदल जाएगी। फिर हम नहीं पूछेंगे “समय कहाँ है?”, बल्कि पूछेंगे “हमारा समय ले कौन रहा है?”

क्योंकि समय सबको बराबर मिला है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई अपना समय जीता है, और कोई दूसरों का समय खरीदकर अपना महल बनाता है।

-आनंद पाण्डेय “केवल”

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