कितना सुहाना था अपना बचपन।
जिसमें महके बस खुशियों का चंदन।
सुबह शाम की कोई खबर नहीं थी ,
पढने और खेलने का न कोई बंधन।
मिलकर पाठशाला जाते थे सब मित्र,
आराम से पढ़ते -खेलते, बनाते थे चित्र।
जब पढ़कर वापस आते, बस्ता रखते,
हाथ धोकर खाना खा बाहर भग जाते।
तब बोझिल नहीं थी पढ़ाई, सहजता थी,
न कोई विशेष कक्षा जाने की बाध्यता थी।
हर मौसम को आंखों में भर आंनद लेते
बारिश में भीगते कागज़ की नाव तैराते।
हरियाली थी ,बगीचे होते कितने सारे,
खेलकूद करते ,पेड़ों पर चढ़ते, उतरते।
बडे़ क्या हुए खो गया बचपन का धन
चिंता रहित जीवन, लौट आए फिर बचपन।
-डॉ अमृता शुक्ला
