कच्ची सड़क पर पड़ती धूप
चार परछाइयाँ एक साथ
बस्तों का बोझ हल्का है
जब कंधे दोस्ती के हों।
एक के हाथ में दूसरी की ऊँगली
तीसरा बातों में मशगूल
चौथा देख रहा है दूर
जहाँ पहाड़ के पीछे स्कूल।
ना शोर है, ना जल्दी है
बस पाँव की थाप और हँसी
सुबह की हवा पूछती है
बताओ, क्या बनोगे बड़े होकर?
कोई कहता डॉक्टर
कोई मास्टर जी
कोई कहता फौजी बनूंगा
कोई चुप है, बस चल रहा है।
इनके लिए स्कूल इमारत नहीं
खिड़की है बड़ी दुनिया की
जहाँ खेत खत्म होते हैं
वहीं से इनका आसमान शुरू होता है।
माँ ने रोटी बाँधी है
बाबा ने कहा पढ़ लेना
मिट्टी ने कहा लौट आना
देश ने कहा बढ़ जाना।
ये चार कदम हैं अभी
कल कारवाँ बनेंगे
और इस गाँव की पगडंडी
एक दिन दिल्ली तक जाएगी।
जय हिन्द जय हिन्दी
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
