ना सोई रात भर और रात भर तुम रोई
ना शिकवा किया ना शिकायत की कोई
है गम कितना अंदर, हैं उलझनें भी कितनी
सब छुपा है अंदर जैसे है सागर गहरा कोई
लाख कोशिश करी छुपाने की आँखो की नमी
लेकिन तुम्हारी खामोशी बहुत कुछ कह गई
हमदर्द हूँ तुम्हारा मैं ,दर्द को समझता ना कैसे
तुम बहती दरिया हो ,मैं हूँ उस के सागर जैसे
लरजती बलखाती नदिया आ के मिलती है जिसमें
कौन किससे मिला और समाया है किसमें
एक बार मिल जायें तो कहाँ दिखती हैं लकीरें
साथ साथ बहते चलते जाते हैं गंतव्य तक दोनो
आओ तुम भी मिलो मुझसे ऐसे ही मेरी बात मानो
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
