मैं सागर हूँ
न आदि,न अंत
मैं हूँ अनत
मेरी गहराई मैं नहीं
जानता
मैं खुद अनजान हूँ
अपने खजाने से
मोती, शंख,रत्न भंडार
मैं हूँ अपार
रहस्यमय।
कितने जहाज़ निगल गया मैं
कितनी कहानियाँ सोती हैं
मेरे सीने की तह में
न गिनती है, न हिसाब।
ऊपर से नीला, शांत, साफ़
जैसे कुछ छुपा ही न हो
पर ज़रा डूबो तो सही
हर गहराई में एक नया ख़्वाब।
पुराने शहर सोए हैं मुझमें
टूटी कश्तियाँ, खोए हुए ख़ज़ाने
मेरी हर लहर एक पहरेदार है
जो राज़ को राज़ ही रहने देती है।
रात को जब चाँद नहीं होता
मैं आसमान से बात करता हूँ
तारे टूट कर गिरते हैं
और मेरी गोद में खो जाते हैं।
किनारे पर खड़े लोग
सिर्फ़ मेरा चेहरा पढ़ते हैं
उन्हें क्या खबर
मेरे भीतर कितने समंदर और बसते हैं।
मैं रहस्य हूँ
जिसे सुलझाने निकले थे सब
और खुद एक सवाल बन गए
मेरी अथाह गहराई में।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
