सच जो कभी हार नहीं मानता ,भले ही जीतने में थोड़ी देर लगे लेकिन जीतता जरूर है, बस साहस से सामना करना होगा,कदम नहीं लड़खड़ा ऐंगे,ये प्रण लेना होगा कि मुझे हारना नहीं है,चाहे कुछ भी हो,मुझे जीतना है,सच की राह पर चलकर, अब आंधी आए या तूफान, आग बरसे या पानी,यही सोचकर निडर होकर खून करके सुरभि की गर्दन गर्व से तनी थी,क्योंकि उसने उन दरिंदों को सजा दी थी,जो उसकी मासूम बेटी के अस्मत के लुटेरे बलात्कारी और हत्यारे थे,उसका बदला लेकिन वह आज अपराजिता कहलाई,अपनी मासूम बेटी को जिताकर खुद भी जीत गई।
-किरण मोर
कटनी (म.प्र)
