तूने थामी मेरी, उंगली जब से सजन
जीने की मुझको, अदा आ गई
चांदनी भी मेरी सहेली हुई
आसमानों से मुझको सदा आ गई
भीग कर नेह में, मैं तो सावन हुई
तू जो बादल हुआ, मैं भी आंगन हुई
साथ में चल पड़े, दो अधूरे सपन
तू जो राधा हुआ, मैं भी मोहन हुई
नैनो से तेरे जो प्रणय निवेदित हुआ
चेहरे पे मेरे भी हया आ गई
चांदनी भी मेरी सहेली हुई
आसमानों से मुझको सदा आ गई
प्रेम की वेदिका जो, अलंकृत हुई
मन के तारों में, वीणा झंकृत हुई
टेसुओं से भी रंग, बिखरने लगे
मन भी फागुन हुआ, मैं भी फागुन हुई
शब्द जब व्यर्थ हुए, मौन में अर्थ हुए
झिलमिलाती हुई सबा आ गई
चांदनी भी मेरी सहेली हुई
आसमानों से मुझको सदा आ गई
तूने थामी मेरी………
-अनुपमा शर्मा
रुड़की
