अन्तरा शब्दशक्ति एक समर्पित साहित्यिक, सामाजिक एवं प्रकाशन संस्था है, जिसकी स्थापना हिन्दी भाषा, साहित्य और रचनाकारों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से की गई। यह संस्था न केवल साहित्य सृजन को बढ़ावा देती है, बल्कि समाज सेवा, सांस्कृतिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों के संरक्षण हेतु भी निरंतर कार्यरत है।
संस्था का मूल उद्देश्य उन रचनाकारों को मंच प्रदान करना है, जो अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहते हैं। यहाँ नए और अनुभवी दोनों प्रकार के साहित्यकारों को समान अवसर, सम्मान और मार्गदर्शन दिया जाता है।
अन्तरा शब्दशक्ति आज देश-विदेश के हज़ारों रचनाकारों, संपादकों, पाठकों और साहित्य प्रेमियों से जुड़ी हुई है और निरंतर हिन्दी साहित्य को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है।
अन्तरा शब्दशक्ति की साहित्यिक यात्रा 2 फरवरी 2016 से आरंभ हुई। प्रारंभ में यह एक रचनात्मक समूह के रूप में अस्तित्व में आई, जिसने धीरे-धीरे साहित्य सेवा के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
14 मार्च 2018 को अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन की स्थापना हुई, जिसके अंतर्गत पुस्तकों, साझा संकलनों, ई-बुक्स और लघु पुस्तिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।
1 जून 2019 से यह संस्था एक पंजीकृत सेवा संस्था के रूप में भी कार्यरत है।
संस्था ने अल्प समय में ही साहित्यिक क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं और विशेष रूप से कोरोना काल में रिकॉर्ड संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन कर एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया।
डॉ. प्रीति समकित सुराना एक प्रतिष्ठित स्वतंत्र लेखिका, संपादक, प्रकाशक, टैरो-न्यूमरोलॉजिस्ट, हीलर, काउंसिलर एवं रेकी ग्रैंड मास्टर हैं। आपने समाजशास्त्र विषय में पीएचडी की है और वर्षों से साहित्य, समाज सेवा एवं प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दे रही हैं।
आपकी लेखनी में संवेदना, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों की स्पष्ट झलक मिलती है। आपने 500 से अधिक पुस्तकों का संपादन किया है तथा 50 से अधिक ई-मैगज़ीन का संपादन किया है। आपकी रचनाएँ भारत सहित विदेशों में भी प्रकाशित हुई हैं।
डॉ. प्रीति समकित सुराना का उद्देश्य साहित्य को केवल रचना तक सीमित न रखकर उसे सेवा, संस्कार और समाज निर्माण का माध्यम बनाना है।
अन्तरा शब्दशक्ति और डॉ. प्रीति समकित सुराना को साहित्य सेवा के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं।
अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन के अंतर्गत कविता संग्रह, कथा संग्रह, साझा संकलन, विचार संग्रह, धार्मिक एवं सामाजिक विषयों पर आधारित पुस्तकों का संपादन एवं प्रकाशन किया गया है।
विशेष रूप से कोरोना महामारी के दौरान संस्था ने मात्र 51 दिनों में 121 पुस्तकों का प्रकाशन कर साहित्यिक क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया।
पीएचडी थीसिस
(समाज शास्त्र — महिलाओं का सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में योगदान)
गद्य लेखन का महत्व (आलेख पुस्तिका)
विचार क्रांति (हिन्दी पर विशेष विचार संकलन)
मन की बात (कविता संग्रह)
मेरा मन (कविता संग्रह)
कतरा-कतरा मेरा मन (कथा/काव्य संग्रह)
काश! कभी सोचा होता,.. (व्यंग्य काव्य संग्रह)
आपातकाल में सृजन फुलवारी (काव्य संग्रह)
प्रीत के गीत (गीत–नवगीत संग्रह))
दृष्टिकोण (आलेख संग्रह)
छोटी-छोटी बातें (टेबिल कैलेंडर आधारित लेख)
जोगराज जी का वंशवृक्ष (परिवार परिचय)
संभावनाथ परिवार (डायरेक्टरी एवं प्रेरक मुक्तक)
अन्तरा शब्दशक्ति (संस्था परिचय)
सुनो! (बात मन की,..) (विशेष अभिव्यक्ति संग्रह)
सृष्टि मेरे आँचल में..! (कविता ग्रीटिंग बुक)
स्प्रिचुल कॉर्नर (मेनिफेस्टेशन डायरी)
कर्म इक्तीसा (धार्मिक पुस्तिका)
कविता/गीत संग्रह: भावनाएँ, रिश्ते, मनोभाव और जीवन के विविध रंग।
समाज एवं विचार: लेखिका के सामाजिक, वैचारिक और भाषाई चिंतन का दर्पण।
आध्यात्मिक/धार्मिक: प्रेरणा, आत्मिक ऊर्जा और साधना केंद्रित रचनाएँ।
अन्तरा शब्दशक्ति का मिशन साहित्य सेवा को एक आंदोलन के रूप में स्थापित करना है।
हमारा मिशन है:
हमारा विज़न हिन्दी भाषा और साहित्य को वैश्विक स्तर पर सशक्त पहचान दिलाना है।
हम मानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और शब्दों के माध्यम से चेतना, संवेदना और संस्कारों का निर्माण किया जा सकता है।
अन्तरा शब्दशक्ति का उद्देश्य साहित्य को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखकर उसे जन-जन तक पहुँचाना, नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ना और रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करना है।
अन्तरा शब्दशक्ति सोशल मीडिया एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से निरंतर साहित्य प्रेमियों से जुड़ी हुई है।
हमारी वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नियमित रूप से साहित्यिक रचनाएँ, समाचार और गतिविधियाँ साझा की जाती हैं।
“साहित्य समाज का दर्पण मात्र नहीं होता, बल्कि वह समाज को दिशा देने वाला दीपक भी होता है, जो अंधकार में मानवता को अपने मूल्यों की याद दिलाता है।”
“जब मनुष्य अपने भीतर झाँकता है, तब उसे यह बोध होता है कि सच्ची शक्ति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और सतत कर्म में निहित होती है।”
“शब्द केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं होते, वे संवेदनाओं के संवाहक होते हैं; जब शब्द सत्य और करुणा से जुड़ जाते हैं, तब वे समाज की आत्मा को स्पर्श करते हैं।”
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