पुरातन तीन युगों में अपनी सार्थकता सिद्ध करते हुए इस युग में इस पंक्ति ने अपने अर्थ में बदलाव उत्पन्न कर लिया है।
परोपकार निश्चय ही इस जीवन का भी एक अभिन्न अंग है,परन्तु सब कुछ नहीं।आज के जीवन में बेजुबानों के लिए कुछ करना फिर भी ठीक है,परन्तु किसी इंसानी चेहरे के प्रति परोपकार करते हुए खुद को भूल जाना बिल्कुल गलत है।किसी भी बड़े छोटे को खुद से ज्यादा अहमियत देना आज के समय की सबसे बड़ी भूल है।अगर आप ऐसा करते है,तो आप पुरातन समय में ईश्वर तुल्य माने जाने वाले इंसान तो नहीं बनेंगे,परंतु हां ,उस पायदान की तरह हो जायेंगे जो सबके पैरों की गंदगी साफ करेगा ,पर उसे साफ करने वाला शायद ही कोई होगा। जीवन ने जो दिखाया और सिखाया है उस हिसाब से कहा जाए,तो पशु पक्षियों के लिए आपका प्रेम सराहनीय होगा,परन्तु किसी इंसान को खुद से ज्यादा तबज्जों देना,बेवकूफी होगी।खुद के लिए जिए,दूसरों को अपने जीवन का कितना और कौन सा हिस्सा देना है,इसका निश्चय आपको समझदारी से करना होगा।क्योंकि आपका यह जीवन आपको दुबारा नहीं मिलेगा।
-सोनम लड़ीवाला
जयपुर (राजस्थान)
