अपराजिता

   मधु के हाथ में गरम चाय की प्याली से उठती भाप और तरुण के लबों के बीच दबी सिगरेट से उठते धुऐं के छल्ले  उफ्फ् गहरी सासों की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी दोनों की पीठ सटी हुई थी और कंधे एक दूसरे के सिर को सहारा दिए हुए थे आखिर हम जीत गए मधु मधु का हाथ पकड़कर धीरे धीरे सरकते हुए तरुण ने अपना सिर मधु की गोद में रखते हुए कहा मधु की कोरों से ढुलती बूँदे तरुण के माथे पर गिर पड़ीं  जो उसकी आजादी और खुशी को प्रदर्शित कर रही थीं। 
     अब तो मुस्कुराने के दिन हैं पगली रो तो वो रहे होंगे।
  ये तो खुशी के आँसू हैं, हमारी जीत के तुम्हें पता है इतने अरसे उस कैद में रह कर मेरी आँखो से कभी एक आँसू नही टपका उन्हें अपने अंदर एकत्रित कर मैंने अपनी हिम्मत बना लिया, तुम भी तो मेरी उसी निडरता से प्रभावित हुए थे याद है ना।
      हाँ भाई याद है वो मैं कैसे भूल सकता हूँ  , और तरुण की आँखो में तैर गई वो रात जब चंद रुपयों के एवज वो रात बिताने के लिए मधु के कमरे में पहुँचा और मधंम सी रोशनी वाले कमरे के दरवाजे की कुंडी चढ़ाते समय उसे अपनी पीठ पर किसी नुकीली चीज के गड़ने का एहसास हुआ जब तक कुछ समझ पाता एक कठोर मगर खनकती आवाज कानो से टकराई  जान प्यारी है तो मेरी तरफ आने की सोचना भी मत और खबरदार जो बाहर जा कर अंदर की कथा बांची तो तुमसे पहले भी कई तीसमारखा आए और चले गए मेरे से कोई ऐसी वैसी हरकत करने की कोशिश की तो कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोडूंगी।
     ठीक है ठीक है मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगा रिलैक्स, लेकिन ये छुरी तो अलग करो, तरुण ने उसे पीछे धकेलते हुए कहा मधु लडखड़ा गई, उसकी आँखो में एक डर तैर गया ओह ये तो जवान है और नशे में भी नहीं है इससे बचना मुश्किल होगा, अपने बचाव के लिए तुरंत दिमाग यहाँ वहाँ दौड़ने लगा मगर तरुण की ओर से कोई हरकत नहीं हुई, डरो नहीं यहाँ नई हो?

हाँ,, नहीं तो महीनो हो गए।
तुम नये हो?
हाँ!
यहाँ कैसे पहुँची?
सहेली ने दुश्मनी निभाई है।
कब तक बचोगी?
जब तक बाहर नहीं निकल जाती।
अब तुम्हें बाहर कौन स्वीकार करेगा, शायद तुम्हारे माता-पिता भी नहीं !!
अगर मैं कहूँ मैं हार नहीं मानने वाली दुनिया बहुत बड़ी है, मेरी माँ कहती थी जब तक हम हार नहीं मानते हमारी जीत निश्चित रहती है , अब तक मैं अपराजित हूँ यहाँ आने वाले हर शख्स का वो हाल किया की न दुबारा आया न किसी से कहा।
बड़ी बात है! मैं तरुण चलो फिर जल्द मिलेंगे।
उस दिन के बाद मधु केवल तरुण की हो गई उसके कमरे में फिर कोई दूसरा नहीं आया। तरुण रोज आता थोड़ा समय मधु के कमरे में बैठता कुछ खामोशी कहती, कुछ बातें होती साथ ही वो उस मकान के चारों तरफ का जायजा लेता, तरुण ने मधु को जीताने का वादा किया था, आज वो पूरा हुआ, मधु आजाद है उस दलदल से साफ-सुथरी बेदाग निकली अपराजिता, हाँ अपराजिता ही तो है वो!!

-स्मृति गुप्ता
जबलपुर

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