अपराधबोध

राजदीप और रणदीप ।
18 एकड़ जमीन और गाँव में अच्छी खेती बाड़ी।
रणदीप की सरकारी नौकरी थी और वह बाहर किसी शहर में नियुक्त था।
पिता के निधन के बाद राजदीप अपने माँ को लेकर गाँव में रहता था।
उपज के कुछ अनाज को रणदीप के लिए भी भेज देता था।
रणदीप भी खेती बाड़ी के समय रूपये पैसे का मदद कर देता था।
अपने परिवार और बच्चों के साथ दोनों भाई अपने अपने स्थानों में रहकर सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे।
शायद समय की मंशा कुछ अलग रहा होगा।
राजदीप की पत्नी मीरा के मन में कुछ अलग खिचड़ी पक रहा थी।
मौका पाकर मीरा ने राजदीप से कहा।
सुनो जी!
रणदीप की नौकरी है और उसकी और उसके बच्चों की जिंदगी सुरक्षित है ।
तुम्हारी नौकरी नहीं है और खेती बाड़ी मात्र से हमारा भविष्य सुरक्षित नहीं है।
माता जी की सेवा भी हम ही कर रहे।
रणदीप कहाँ कभी माॅं को अपने पास रखना चाहता है।
मेरी मानो तो जमीन का बंटवारा कर लो।
बंटवारे से पहले छ:एकड़ को अपने नाम माँ से रजिस्ट्री करा लो।
शेष 12 एकड़ में आधा-आधा बांट लो।
हमारे दो बच्चे हैं।
नौकरी नहीं भी मिलेगी तो खेती बाड़ी करके जी लेंगे ।
मीरा की बातें सुनकर एक बार तो राजदीप क्रोधित हुआ।
उसे लगा कि यह तो भाई के साथ धोखा करने जैसा है।
पर मीरा की यही एक रट से राजदीप भी टूट गया।
बेमन से ही सही पर राजदीप अपनी माँ को शहर ले जाकर छ: एकड़ जमीन अपने नाम करा लिया।
एक साल के अंतराल में रणदीप जैसे ही अपना गाँव आया, रणदीप के शुभचिंतकों ने रणदीप को राजदीप के कारनामों का पोल खोल‌ दिया।
रणदीप ने यह सुनकर भी किसी को कुछ नहीं कहा।
दिनभर घर में रहकर भी राजदीप से भी कुछ नहीं कहा।
दूसरी ओर राजदीप अपराधबोध से रणदीप से आंखें नहीं मिला पा रहा था।
रात के खाने में दोनों भाई एक साथ बैठे।
दोनों ही चुपचाप थे।
राजदीप से रहा नहीं गया तो उसने रणदीप को जमीन रजिस्ट्री का सच बता दिया।
राजदीप को डर था कि रणदीप गुस्से में आकर हमें कुछ कहेगा।
पर रणदीप ने मुस्कुराते हुए कहा।
इसे छिपाने की क्या बात है।
गलती क्या?
जमीन जायदाद से ज्यादा जरूरी है हम भाईयों का मिलकर रहना ।
संपत्ति तो हाथ का मैल है जो अंत में छूट ही जाता है।
आपको मैं और मुझको आप कहाँ मिलेंगे।
ऐसे भी बड़े भाई का हिस्सा छोटे से अधिक होता ही है।
हम जीते में साथ रहें, खाएं पीयें मुस्कुराएं।
मेरी यही कामना है भैया।
रणदीप यह कहकर चुप हो गया।
राजदीप और मीरा की आंखों में पश्चाताप के आंसू थे।।

-अजय पाण्डेय ‘बेबस’

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