असंख्य हाथों का बच्चा

मेरे बच्चे
तुम्हें केवल मैंने नहीं बनाया
जैसे कि मुझे सिर्फ़ मेरे माता-पिता ने नहीं बनाया था
मेरी ही तरह
तुम्हारी हड्डियों में पहाड़ हैं,
रक्त में नदियां हैं,
सांसों में वृक्ष हैं,
आंखों में सूरज, चांद और असंख्य तारों की रोशनी है

रोटी में किसान का पसीना है,
किताबों में वैज्ञानिकों की जागी रातें,
भाषा में अनगिनत पीढ़ियों की स्मृतियां,
और जीवन में असंख्य अनजान हाथों का स्पर्श

माता-पिता हैं,
पर वे निर्माता नहीं

वे तो बस वह द्वार हैं
जिससे होकर संसार
उसके भीतर प्रवेश करता है।

ध्यान रहे कि
द्वार बने रहना,
दीवार मत बन जाना

क्योंकि दीवारें बच्चों को
अपनी दुनिया दिखाती हैं,
द्वार उन्हें दुनिया दिखाते हैं

और जो दुनिया को देख लेता है,
वह कृतज्ञ हुए बिना नहीं रह सकता

वह जान जाता है कि
उसका होना अकेले उसका होना नहीं है

उसमें हवा का हिस्सा है,
वर्षा का हिस्सा है,
धरती का हिस्सा है,
असंख्य ज्ञात-अज्ञात जीवनों का हिस्सा है

यही बोध मनुष्य को विनम्र बनाता है
और विनम्रता का चरम यह है कि
धीरे-धीरे जातियां धुंधली पड़ने लगती हैं,
मज़हब छोटे पड़ने लगते हैं,
समुदायों की सीमाएं क्षीण होने लगती हैं

फिर मनुष्य केवल मनुष्य दिखाई देता है
कृतज्ञता दरअसल
अपने छोटे-से “मैं” से निकलकर
उस विराट “हम” को देख लेने का नाम है,
जिसके अनंत हाथों ने मिलकर
मेरे माता-पिता को बनाया था
फिर मुझे
और अब तुम्हें बना रहे हैं।

-उपेंद्र रघुभामा

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