‘आँगन’ से ‘आकाश’ तक

जून की सुबह नूपुर सदन के लोहे के गेट पर ऑटो रुका। काव्या दो अटैची और किताबों के कार्टन के साथ उतरी।

काव्या : 24 वर्षीया, बेटी एम.ए. पॉलिटिकल साइंस, बी.एड.। कॉलेज हॉस्टल से लौटी है। स्वभाव : ‘गौरैया’ सी चंचल, ‘बरगद’ सी सहनशील प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही है।

सुधा [दौड़कर, आँचल से पसीना पोंछते हुए] : “आ गई मेरी गौरैया! चार साल में ‘हॉस्टल’ को ‘घर’ बना लिया था तूने। अब ‘घर’ को ‘हॉस्टल’ मत बना देना।”

सुधा : 55 वर्षीया, माँ गृहिणी ‘स्मृति’ की ‘अलमारी’ है — बेटी की हर चीज संभालकर रखती हैं।

काव्या माँ के गले लगकर, हँसते हुए : “माँ, ‘हॉस्टल’ में ‘वार्डन’ डाँटती थी, यहाँ तुम डाँटोगी। ‘सिलेबस’ वही है, ‘टीचर’ बदल गई।”

शिवानंद [दरवाजे पर खड़े, अखबार तह करते हुए, आवाज में कड़ापन पर आँख में नमी] : “आ गई ‘कलेक्टर साहिबा’? अब ‘घर’ का ‘ऑडिट’ करोगी? देख लेना, तेरे बाप की ‘फाइल’ बहुत ‘अस्त-व्यस्त’ है।”

शिवानंद : 59 वर्षीय, पशुधन अधिकारी। सेवानिवृत्ति के कगार पर। अनुशासनप्रिय, परन्तु भीतर से बेहद भावुक पिता। ‘डायरी’ में ‘ड्यूटी’ लिखते हैं, ‘दिल’ में ‘बेटी’।

काव्या ने बाप की बात का जवाब नहीं दिया। सीधे आँगन में तुलसी के चबूतरे के पास गई, लोटे से पानी दिया, फिर छत पर चढ़कर कबूतरों को दाना डालने लगी।

काव्या [छत से आवाज लगाकर] : “पापा, आपके ‘क्लाइंट’ आ गए! ‘गुटर-गूँ’ कर रहे हैं। ‘फीस’ में ‘दाना’ माँग रहे हैं।”

शिवानंद [मुस्कुराकर, सुधा से] : “देखा? चार साल ‘पॉलिटिकल साइंस’ पढ़कर आई है, अब ‘कबूतर-साइंस’ की ‘प्रोफेसर’ बन गई।”

दोपहर तक काव्या ने घर का ‘नक्शा’ बदल दिया। बिखरे अखबार ‘तारीख-वार’, ‘पुस्तकें’ ‘विषय-वार’, ‘मैगजीन’ ‘माह-वार’। शिवानंद की मेज पर ‘इमरजेंसी-किट’ तैयार — डायरी, चश्मा, पेन, रुमाल, स्कूटर की चाबी, ऑफिस की चाबी, ‘एट्रोवास्टेटिन’ की स्ट्रिप।

सुबह 8:30 बजे।

शिवानंद यूनिफॉर्म पहनकर निकलने को तैयार।

काव्या [चाबी का छल्ला पकड़ाते हुए] : “पापा, ‘याददाश्त’ का ‘रिमोट’ मैं हूँ। ‘चश्मा’ नाक पर, ‘डायरी’ बगल में, ‘बी.पी. की गोली’ जेब में। ‘स्कूटर’ ‘न्यूट्रल’ में नहीं, ‘फर्स्ट-गियर’ में रखना।”

शिवानंद [छल्ला लेते हुए, गला भर आया] : “पहले ‘मरीज’ भेड़-बकरी सँभालता था, अब ‘मरीज’ मैं हो गया हूँ। तू ‘डॉक्टर’ कब बन गई?”

काव्या [हँसकर] : “जब से आप ‘रिटायरमेंट’ की ‘उल्टी गिनती’ गिनने लगे। ‘सरकारी नौकर’ की ‘एक्सपायरी’ होती है, ‘बाप’ की नहीं। जाओ, ‘टाइम’ हो गया।”

शाम 7 बजे।

सांझ ढल चुकी। स्कूटर की आवाज सुनते ही काव्या गेट खोल देती। हाथ से बैग लेती, पानी का गिलास देती।

काव्या : “पापा, ‘थर्मामीटर’ बन जाओ। ‘बुखार’ कितना है ‘डिपार्टमेंट’ का?”

शिवानंद [जूते उतारते हुए, थकान में] : “आज ‘निराश्रित गौवंश’ का ‘टीकाकरण’ था। ‘गरमी’ बहुत थी।”

काव्या [रात के खाने के बाद, दवा की स्ट्रिप निकालकर] : “गरमी ‘बाहर’ की थी, ‘बी.पी.’ ‘भीतर’ का मत बढ़ने देना। लो, ‘एट्रोवास्टेटिन’। ‘कल’ फिर ‘गौसेवा’ है।”

तीन महीने बीत गए।

सितंबर की एक दोपहर। काव्या के मोबाइल पर मैसेज बीप हुआ। ‘RPSC Grade-II Teacher Result’। काव्या की आँखें चमक उठीं — ‘Selected’।

पोस्टिंग : ‘राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, सपोटरा, करौली’।

घर में ‘लड्डू’ बँटे। पर शिवानंद की थाली में लड्डू ‘सूखा’ लगा। रात को छत पर अकेले टहल रहे थे। काव्या पीछे से आई।

काव्या : “पापा, ‘सपोटरा’ तो आपका ‘पुराना इलाका’ है। ‘डांग’ के ‘रेबारी’ याद हैं? अब उनकी ‘बेटियाँ’ पढ़ाऊँगी।”

शिवानंद [आकाश की तरफ देखते हुए] : “हाँ। ‘डांग’ में ‘भेड़’ चराता था, अब मेरी ‘बेटी’ ‘भविष्य’ चराएगी। ‘पोस्टिंग’ तो ‘सुकून’ की है, पर ‘पिता’ का ‘दिल’ ‘ट्रांसफर’ नहीं होता बेटा।”

काव्या [पिता का हाथ पकड़कर] : “पापा, ‘बरगद’ अपनी ‘टहनी’ से ‘नाराज’ नहीं होता। वो जानता है, टहनी ‘नया बरगद’ बनने जा रही है।”

दो महीने बाद विवाह।

आकाश ‘दामाद’ बनकर आया, पर ‘बेटा’ बनकर रह गया।

आकाश : 27 वर्षीय, काव्या का पति। सरकारी अध्यापक। ससुराल में ‘दामाद’ कम, ‘बेटा’ ज्यादा बन गया है।

विदाई की रात।

सुधा [रोते हुए] : “घर ‘सूना’ हो जाएगा लाली।”

काव्या [माँ के आँसू पोंछकर] : “माँ, ‘गौरैया’ ‘घोंसला’ छोड़ती है, ‘आँगन’ नहीं। ‘चहचहाहट’ ‘स्मृति’ में छोड़कर जा रही हूँ। ‘बजाने’ के लिए ‘बाबूजी’ हैं न।”

शिवानंद [गंभीर स्वर में, पर कम्पन के साथ] : “जा बेटा। ‘दूसरे घर’ की ‘लक्ष्मी’ बन। ‘वंश-परंपरा’ को आगे बढ़ा। पर ‘हाँ’… ‘झुंझलाना’ मत। ‘ससुराल’ में भी ‘पापा-पापा’ कहना। ‘आवाज’ ‘दीवारें’ पार कर जाती है।”

डोली उठी। आँगन ‘खाली’ हो गया।

30 जून 2026।

सेवानिवृत्ति का दिन।

शिवानंद ‘नूपुर सदन’ के आँगन में बैठे हैं। तुलसी के पास ‘पानी’ का लोटा रखा है, पर ‘काव्या’ नहीं है।

तभी मोबाइल बजा। वीडियो कॉल — काव्या। गोद में 2 साल का बेटा।

काव्या : “पापा, आपका ‘पोता’ ‘पापा-पापा’ बोलना सीख गया। ‘बरगद’ की ‘नई टहनी’ आ गई।”

शिवानंद [आँख भरकर, मुस्कुराकर] : “संतोष है बेटा। तू ‘अपने घोंसले’ में खुश है, ‘लंबी उड़ान’ भर रही है ‘हमसफर’ के साथ। ‘मातृशक्ति’ हो तू। ‘बेटी’ नहीं, ‘बेटा’ है तू मेरा।”

काव्या : “पापा, ‘रात की दवाई’ ले ली?”

शिवानंद [हँसकर] : “ले ली बेटा। ‘डायरी’ में ‘टिक’ कर दिया। तू नहीं है, पर ‘आदत’ छोड़ गई है।”

कॉल कट गई।

शिवानंद ने आँगन में देखा — कबूतर ‘दाना’ चुग रहे थे। तुलसी ‘हरी’ थी। ‘हवा’ में अब भी ‘पापा-पापा’ की ‘गूँज’ थी।

‘बेटी’ ‘स्मृति’ में थी, पर ‘स्मृति’ ‘खाली’ नहीं थी — ‘संतोष’ से ‘लैस’ थी।

-ब्रह्मानंद गुप्ता ‘ब्रह्मपाद’
हिंडौन सिटी (राजस्थान)

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