रोला छंद
आई मस्त बहार, खुशी के बदरा छाए।
हर सू खिला निखार, फ़िज़ा रिमझिम है गाये।
कोयलिया की कूक, ह्रदय में प्रेम जगाये।
आज सखी मदमस्त, जियरवा उड़ता जाए।।
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उठी घटा घनघोर, दिलों में मस्ती छाई।
भंवरे हैं मदहोश, गुलों पे तितली आई।
पंछी धूम मचायॅ॑, कि सब आलम सौदाई।
पुर्वा भी है गीत सुहाने गाती आई।
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घने गगन में मेघ, धरा पर मस्ती छाई।
सावन की बरसात, सुधा छलकाती आई।
रिमझिम, रिमझिम होय, फिज़ा ने ली अंगङाई।
ऐसी पङी फुहार, दिलों की प्यास बुझाई।।
-राकेश मल्होत्रा
