खुद के पैसे से ख़ुद को सजाने लगे हैं लोग,
आईनों को भी अब आज़माने लगे हैं लोग।
चेहरे पे चेहरा रख के निकलते हैं इस तरह,
सच्चाई से नज़रें चुराने लगे हैं अब लोग।
लब मुस्कुरा रहे हैं, मगर दिल उदास है,
मेकप से दर्द-ए-दिल छुपाने लगे हैं लोग।
सादगी की बात अब किताबों में रह गई,
फ़िल्टर में ज़िंदगी को बिताने लगे हैं लोग।
जिस हुस्न में वफ़ा की चमक तक नहीं रही,
उस हुस्न पर जहाँ को लुटाने लगे हैं लोग।
थोड़ी सी बारिशों में उतर जाए जो नक़ाब,
उस रंग को भी इश्क़ बताने लगे हैं लोग।
चेहरे नहीं, किरदार सँवारे तो बात थी,
बस रंग- रोग़नों पे इतराने लगे हैं लोग।
-ओमप्रकाश प्रजापति
