जुड़ न पाया जो कभी आधार से
है पटकता सर कहीं दीवार से
इश्क करना जुर्म है तो हो गया
क्यों परेशाँ हो मेरे क़िरदार से
प्यास मुद्दत से नहीं दिल की बुझी
बुझ रही है आसूओं की धार से
जख़्म दिल को मिल रहे हैं मुफ़्त में
दर्द हासिल प्यार के बाज़ार से
दिलजले ही दिलजले चारों तरफ
जल रहे हैं हुस्न की अंगार से
आज दिनकर खुदकुशी की राह पर
बाज़ आया प्यार के व्यापार से
-दिनकर राव दिनकर
