आप भी मानते हैं न

बहुत ज़रूरी खाली बर्तन दिखना भरा-भरा सा
ऊपर तक जो भरा पर वो छलके ज़रा-ज़रा सा

मन भर कैसे जिएगा ये मन ,मन से मन ये पूछे
रहे मिलावट की दुनिया में, कैसे खरा-खरा सा

देख के भी जो देख सके न ,छूकर भी छू पाए न
बारिश में वो कैसे देखे, सावन हरा- हरा सा

नहीं चले तो न्यारा होजा,पूरा होजा,सारा होजा
ठान लिया तो क्यों लटकाया, मुँह ये मरा-मरा सा

क्या साथ में तेरे आया था और क्या लेकर जाएगा
जिसको अपना कहे है वो, रह जाए धरा-धरा सा

एक चेहरे पे सौ सौ चेहरे उसपर मुस्कानों के पेहरे
मन, देख के ये झीना सा पर्दा, रहता डरा- डरा सा

-श्रीहरि कृपा
मोनिका शर्मा

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