“सोना – कनक – स्वर्ण”
आशाएं हैं मन में कई,
उलझने दूर हो जाएगी।
संघर्षों से मिलती सफलता,
उम्मीद नई फिर आएगी।
कसौटी पर खड़ा उतरकर,
परख स्वर्ण की हो जाएगी।
उड़ान कल्पनाओं की एक दिन,
पहचान मुझको दिलाएगा।
दुखद काल बीत रहा अब,
मुस्कान फिर लौट आएगी।
जिनमें गहनता हो सागर सी,
आलोचना तोड़ ना पाएगी।
बगिया के महके फूलों की,
सुगंध फेल ही जाएगी।
किरण भौंर की पहली पहली,
अपनी छटा बिखराएगी।
शनै: शनै: फिर ताप मिटेगा,
शीतलता मयंक की छाएगी।
झिल मिलाहट से रोशन,
तारों भरी फिर रात आएगी।
विश्वास प्रगाढ़तम हो रहा,
विजय पताका फहराएगी।
स्वर्णिम शिखर पर नव ध्वजा लहराएगी।
उपासनाएं होगी सार्थक परमातम ये बन जाएगी।
-मुक्ति भंडारी ‘ममता’
पारा, जिला झाबुआ, (मध्यप्रदेश)
