कुछ अपना पता है न ज़माने की ख़बर है।
ये सब किसी के इश्क़ की सोहबत का असर है।
जुल्फ़ों के भँवर जाल में जब उलझे तो जाना,
इक भूल-भुलैए सा मोहब्बत का सफ़र है।
अंगार उगलता हूँ जो दिन रात कलम से,
इसको न ग़ज़ल समझो मेरा दर्द-ए-जिगर है।
इकरार-ए-मोहब्बत से वो इठला के मुकरना,
किस दर्जा दग़ा-बाज़ तेरी शोख़ नज़र है।
ए “अल्प” इबादत से इसे कम न समझना,
चाहत किसी के वास्ते इक तरफ़ा अगर है।
-राखी “अल्प”
