एक बार आश्रम में गुरु ने अपने शिष्यों को एक-एक दीपक दिया और कहा, “आज रात इसे जलाकर रखना। ध्यान रहे, यह दीपक बुझना नहीं चाहिए।”
रात होते ही तेज़ आँधी और वर्षा शुरू हो गई। अधिकांश शिष्यों ने सोचा, “इतनी हवा में दीपक बचाना असंभव है।” कुछ ने प्रयास किया, पर थोड़ी देर बाद हार मानकर सो गए।
लेकिन एक शिष्य पूरी रात जागता रहा। कभी वह अपने शरीर से दीपक को ढँकता, कभी उसके चारों ओर मिट्टी की ओट बनाता। कई बार लौ डगमगाई, पर उसने उसे बुझने नहीं दिया।
प्रातः गुरु ने सभी को बुलाया। अधिकांश शिष्यों के दीपक बुझ चुके थे। केवल एक शिष्य का दीपक जल रहा था।
गुरु ने पूछा, “तुमने ऐसा कैसे किया?”
शिष्य ने विनम्रता से उत्तर दिया, “गुरुदेव, आपने मुझे दीपक सौंपा था। उसे बचाना मेरा उत्तरदायित्व था। यदि मैं परिस्थितियों को दोष देकर सो जाता, तो अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता।”
गुरु मुस्कराए और बोले, “यही जीवन का रहस्य है। परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं के चरित्र का दीपक भी हमें सौंपा गया है। परिस्थितियाँ कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल होंगी, पर जो व्यक्ति अपने उत्तरदायित्व का दीपक जलाए रखता है, वही सच्चे अर्थों में सफल और श्रेष्ठ मनुष्य बनता है।”
शिक्षा: उत्तरदायित्व का अर्थ केवल कार्य करना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक और निष्ठावान बने रहना है।
-डॉ संगीता बिंदल
