कहाँ तक ये मन के अंधेरे चलेंगे,
हैं तन सांसें तब तक ये फेरे चलेंगे
इन्हें काटना हमको खुद ही पड़ेगा,
ये संग अपने सांझ-ओ-सवेरे चलेंगे,
उम्मीद है तो जीवन है,दे सुखों की अनुभूति
कष्ट पग-पग पर मिलेंगे और पेरे चलेंगे।
चलो चलते दिल में लिए हौसले को,
ये लेकर उजासों के डेरे चलेंगे।
कमजोर तू पड़ा तो डरायेंगे तुम को,
खड़े तकते राहों को तेरी बहुतेरे चलेंगे।
ना घबराना मन अपना मजबूत कर ले,
लूटने को तेरा सब बन लुटेरे चलेंगे।
अंधेरों में तन्हा छोड़े परछाईं खुद की
उजालों में तेरे तुझको यूँ घेरे चलेंगे।
-किरण मोर
कटनी
