उल्फ़त में हिसाब-किताब रखा नहीं जाता,
गर लुट जाओ तो किसी से कहा नहीं जाता।
दिल बेवफ़ा पर भी अक्सर आ ही जाता है,
ठोकर खा के रस्ते में गिरा नहीं जाता।
वो महफ़िल मेरी मंज़िल तो कभी ना थी,
लौ देख के परवाने से रुका नहीं जाता।
आ तो गया हूं मैं अमीरों की महफ़िल में
पर कुर्ते का पैबन्द ढका नहीं जाता।
उसके नक्शे-पा आज भी हैं राहों में,
सज्दा मुझसे हर वक़्त किया नहीं जाता।
कर तो रहा हूं रौशन उसकी राहों को,
पर मुझसे उजालों में रोया नहीं जाता।
उपकार किसी का ‘राज’ कभी नहीं लेना,
दब के एहसान के नीचे जिया नहीं जाता।
-राजेश कुमार ‘राज’
