इतिहासों की क्रूर कथायें…..
इतिहासों की क्रूर कथा के कथन जिसे स्वीकार नहीं है।
वह सिंहासन मिटा भला जो सच का पैरोकार नहीं है ।।
किसी क्रूर आतातायी का
पाप बताना जुर्म हो गया ?
हत्यारे का महिमामंडन
कब सत्ता का धर्म हो गया ?
सत्ता मद में राजधर्म की
मर्यादा को हरने वालो ।
राजनीति के गुणा भाग में
कुमति पंथ पग धरने वालो।
करुण कराहों के विपणन का ,राजा को अधिकार नहीं है।।
मत भूलो धरती पर सत्ता
केवल कुछ दिन का मेला है ।
भूप वही है पूज्य कि जिसने
सच के हित संकट झेला है ।
लाभ हानि का धूर्त आकलन
हर सुकृत विस्मृत कर देता।
काल चक्र का निर्मम दर्पण
चेहरों को विकृत कर देता ।
सच का गला घोंटना कोई , न्यायोचित व्यवहार नहीं है।।
सर्व -धर्म सद्भाव मंत्र क्या
मात्र सनातन का ठेका है ?
हम पर सदियों से अन्यायों
अत्याचारों का लेखा है।
सहिष्णुता का जीर्ण तन्तु अब
धीरे – धीरे टूट रहा है ।
कान खोल कर सुन ले दिल्ली
धीरज का संग छूट रहा है।
चिंगारी शोला हो सकती , शायद तुम्हें शुमार नहीं है ।।
विपणन – व्यापार।
शुमार – आकलन, हिसाब ।
-देवेन्द्र सिंह
