जीवन डोर
कटी पतंग साथ
भटकती है
रिश्तों से टूटकर
ज्यों डगर-डगर।।
हवा ले उड़ी
वो अनकही कही
गलियारों के
कानों में फूँक आई।।
अग्नि घी झोंक आई।।
कच्चे कानों में
पैठ बनी गहरी
आँच बहरी
जलाने चल पड़ी
दरवाजे देहरी।।
जहर बुझे तीर
चले पतंग ओर
रिश्तों की डोर
कुछ थी जो लटकी
हवा संग भटकी।।
सँभल जायें
सहेज लें साथिया
रिश्तों की डोर
सह लें कही-सुनी
बाँधे पतंग कटी।।
-हेमलता मिश्र ‘मानवी’
नागपुर (महाराष्ट्र)
