कभी जो थे हमारी उंगलियों पर
छुरी गाड़े खड़े हैं पसलियों पर
चुरायेंगे महक ख़ुद गुल से लेकिन
मढ़ेंगे दोष सारा तितलियों पर
जलाया आशियाँ तो नफरतों ने
रखें इल्ज़ाम कैसे बिजलियों पर
उगल देगी किसी दिन राज़ फाइल
बहुत नाज़ाँ न हो तू सुतलियों पर
झपक लूँ आँख कैसे मैं बताओ
कोई बैठा है मेरी पुतलियों पर
जहाजों पर तुम्हारे है, तो होगा
समंदर बोझ कब है मछलियों पर
मत उसके नाम को बट्टा लगाओ
नचाये जिसने गोरे तकलियों पर
परखना ‘नूर’ को अच्छा बुरा ख़ुद
यकीं मत कीजियेगा चुगलियों पर
-अशोक ‘नूर’
