“सोना – कनक – स्वर्ण”
सोने को कुंदन बनाना बाकी है,
यह संसार मानव कर्मों की झांकी है।
दुर्लभ मानव देह मिला जो,
इससे सत्कर्म करना बाकी है।
रिश्तों की बंजर भूमि पर,
स्नेह का उर्वरक जरूरी है।
कलुषित मन खर पतवार बढ़ें जो ,
समूल मिटाना जरूरी है।
भुला ईर्ष्या द्वेष वैमनस्यता,
इंसानियत निभाना जरूरी है।
अपनों को अपनत्व तो देते सभी हैं,
गैरों को गले लगाना जरूरी है।
मिलती हैं जो सुख-दुःख की पटरी,
उन पर सामंजस्य के कदम जरूरी हैं।
सुखमय जीवन हो सभी का ,
यह सद्भाव जरूरी है।
यह मानव तन भी तो स्वर्ण सम
इसे कुंदन बनाना जरूरी है।
-सीता गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
