अपनों की कोई क़द्र नहीं है,
बहुरुपियों को भाव मिल रहे।
अवसरवादी गिरगिटी वृत्तियों को,
अवसर छप्पनभोगी चाव मिल रहे॥
संघ रंग केसरिया न उतरा,
जीवन झोंक दिया सारा।
पागलपन की लतें गईं न,
चालाकियाँ चर गईं सारा चारा॥
कलिकी कल के राजा बन गये,
ढोंगी ढँग पाखण्डी चालों से।
सम्पूर्ण समर्पणी भटक रहे हैं,
फटहाली आलम में कंगालों से॥
अपने हो गये घोर विरोधी,
सपने हो गये अपने सब।
परम ढकोशली पूज्य हो गये,
यही आज कलियुगी करतब॥
-नील मणि पाण्डेय
