शब्द हों सरल, भाव हों गहरे, यही कवि की पहचान,
मन से निकली सच्ची रचना, छू ले जो हर प्राण।
अक्षर-अक्षर दीप बने जब, मिट जाए अज्ञान,
प्रेम, करुणा, सत्य की गाथा, बन जाए वरदान।
शब्द न केवल तुक में बंधें, उनमें हो एहसास,
सूखे मन के उपवन में भी, भर दें जो मधुमास।
लेखनी का धर्म नहीं है, केवल छंद सजाना,
पीड़ित मन की मौन व्यथा को, जग के सम्मुख लाना।
वाणी ऐसी हो जिसमें हो, विनय और सम्मान,
कटुता के इस शोर में गूँजे, मधुर प्रेम का गान।
कवि वही जो जोड़ सके फिर, बिखरे हुए विचार,
घृणा नहीं, सद्भाव बोए, हर आँगन, हर द्वार।
यश की इच्छा से न लिखे, न लिखे किसी अभिमान,
शब्द बने आराधना जिसकी, वही सच्चा विद्वान।
शब्द हों सरल, भाव हों गहरे, यही कवि की पहचान,
मन से निकली सच्ची रचना,
अमर करे इंसान।
-डॉ संगीता बिंदल
