रात जल्दी आती है
या सुबह देर से आती है,
कहीं तो कुछ गड़बड़ है !
एक दिन के चौबीस घंटों के
मायने ही बदल गए हैं।
घड़ी की सुइयां
अब भी उसी क्रम में चलती हैं,
मगर समय जैसे
अपने ही अर्थ से दूर हो गया है।
चिड़िया चहककर चुप हो जाती है,
मुर्गे की बांग कहीं खो गई है।
सुबह अब भी होती है,
पर न जागती है
न जगा पाती है…
रात अब भी उतरती है,
पर ठहरती नहीं वजूद में।
चिड़िया,
पहले अपनी आज़ादी में थी,
पिंजरे में भी
उसकी आवाज़ सुरक्षित थी,
उसके गीत में
आकाश की खुली छत थी,
हवाओं का भरोसा था।
अब तो हम
उसके हिस्से का जंगल छीनकर
उसके लिए दाना-पानी रखकर
खुद को विशेष मान लेते हैं ।
सुनना कभी समय देकर गौर से-
उसके गीत में अब वो बात नहीं रही।
स्वर वही है,
पर उसमें एक थकान है,
जैसे वह गा नहीं रही,
अपने होने की ख़बर भर दे रही हो।
सिर्फ़ हम ही नहीं,
ये सब भी अपने घर की तलाश में
बेघर हो चले हैं।
पेड़ अपनी जड़ों से कटे हैं,
परिंदे अपने आसमान से,
और मनुष्य
अपने ही भीतर से।
बहुत कुछ पा लेने की जल्दी में
कुछ ऐसा खो दिया है हमने,
जिसका नाम तक याद नहीं आता।
न रात में कोई नज़्म है,
न सुबह में कोई राग,
चाँद निकलता तो है,
मगर किसी कहानी के साथ नहीं,
सूरज उगता है,
मगर किसी उम्मीद को जगाए बिना।
अब शोर इतना बढ़ गया है
कि प्रकृति की सबसे धीमी आवाज़ें
सुनाई देना बंद हो गई हैं।
शायद इसी लिए
रात जल्दी आती है
या फिर सुबह देर से आती है
कहीं तो कुछ गड़बड़ है…
शायद समय में नहीं,
हमारे मन में।
क्योंकि जब संवेदनाएं थकने लगती हैं,
तो सबसे पहले
रात अपनी नज़्म खो देती है
और सुबह अपना राग।
-रश्मि प्रभा
