कुछ दिन रहना चाह रहा हूँ
जाकर निर्जन वन में।
लाभ-हानि का गणित भुला दूँ
अपने सुख-दुख भूलूँ
अंतर्मन की नीरवता के
उच्च शिखर को छू लूँ।
एक लहर-सी मचल रही है
रह-रहकर इस मन में।
देखूँ घिरती शाम कि कैसा
होता घुप्प अँधेरा
सन्नाटे को किरण चीरती
करती जहाँ सबेरा।
चाह रहा हूँ वापस लौटूँ
मैं अपने बचपन में।
विचरण करते वन-जीवों पर
अपना प्यार उड़ेलूँ
उनके जैसा बनकर उनके
संग-साथ मैं खेलूँ।
खोना चाह रहा निर्झर की
छप-छपाक छन-छन में।
थिर पहाड़ की चोटी पर चढ़
मेघ-मल्हार सुनाऊँ
झरते मेघों संग उतरकर
घाटी नीचे आऊँ।
यह अनंत सुख पाऊँ कैसे
उलझा इस उलझन में।
-मनोज जैन
