ईमान बेच खाया.. तू कैसा आदमी है
कुछ शर्म कर ख़ुदाया तू कैसा आदमी है
करता है मान कितना दौलत पे अपनी मूरख
ये तो है धूप छाया तू कैसा आदमी है
परदेस जा के भूला अपने वतन की मिट्टी
फिर लौट के न आया तू कैसा आदमी है
जो कष्ट में था उसका दुख तो न बांटा तूने
उल्टा तू मुस्कुराया तू कैसा आदमी है
देता है जब तू धोका तो देखता नहीं है
अपना है या पराया तू कैसा आदमी है
बेकार ही गवा दी दुनिया में आ के तूने
अनमोल अपनी काया तू कैसा आदमी है
तूने सजाई महफ़िल ख़ातिर में ‘ राज ‘ की जब
उसको ही न बुलाया तू कैसा आदमी है
-राजिंदर सिंह ‘बग्गा’
