कोई लिखता बात विरह की
कोई मिलन के संगम पर
कोई लिखता पांव की छन छन
कोई लिखता कंगन पर।
हम गावों के रहने वाले
हम लिखते हैं आंगन पर
कोई लिखता आसूं,काजल
कोई लिखता जुल्फों पर
कोई लिखता कमर करधनी
कोई लिखता पलकों पर
हम पगडंडी चलने वाले
हम लिखते हैं फसलों पर
लिखता कोई घनघोर घटा पर
कोई काली रातों पर
कोई लिखता अधर सधर पर
कोई प्रेमी के गालों पर
हम पेड़ों पर झूलने वाले
हम लिखते हैं डालो पर
कोई लिखता मामा मंत्री
कोई लिखता आकाओं पर
कोई लिखता प्रेम घृणा पर
कोई लिखता नेताओं पर
हम आंचल में पलने वाले
हम लिखते हैं माताओं पर
कोई लिखता शाम सलोनी
कोई डूबते सूरज पर
कोई लिखता कागज खातिर
लिखता कोई मोहर पर
हम गांवों को सुनने वाले
हम लिखते हैं सोहर पर
कोई लिखता खुद को दीपक
कोई लिखता बाती पर
कोई लिखता माथ कुमकुम
कोई लिखता छाती पर
हम गांवो के सुघर गंवार
हम लिखते हैं माटी पर।
-कंचन तिवारी कशिश
जौनपुर बनारस (उत्तरप्रदेश)
