अचानक शख़्स कोई बेवफ़ा यूँ भी नहीं होता ।
बिछड़ने भर से तो कोई जुदा यूँ भी नहीं होता ।
मुहब्बत हो तो फिर महबूब आंखों में ही रहता है ।
मुहब्बत में तो कोई फ़ासला यूँ भी नहीं होता ।
ज़रूरी है कि उन आंखों के प्याले भी छलकते हों ।
अकेली मय से तो हमको नशा यूँ भी नहीं होता ।
हमारा इश्क़ है जिसने उसे ये हुस्न बख़्शा है ।
महज़ सूरत की दम पर वो ख़ुदा यूँ भी नहीं होता ।
चलो अच्छा किया तुमने झुकाया ही नहीं ये सर ।
वो पत्थर ही था ,पत्थर देवता यूँ भी नहीं होता ।
हज़ारों कोशिशें कीं वक़्त ने बेकार में अब तक ।
हमारा ही था वो ,हमसे ख़फ़ा यूँ भी नहीं होता ।
मुहब्बत का समंदर है वो जो आंखों में रहता है ।
समंदर तो समंदर है , फ़ना यूँ भी नहीं होता ।
-कमलेश श्रीवास्तव
