जागती आँखों से तेरे ख़्वाब कब तक देखता
मैं अकेला बैठकर तालाब कब तक देखता
मुझको अपने तौर से जीना था, सो मरना पड़ा
जो मेरे थे ही नहीं आदाब, कब तक देखता
हार कर इक ग़ैर का एहसाँ उठाना पड़ गया
आप का मुँह हल्क़ा-ए-अहबाब कब तक देखता
आख़िरश आग़ोश में ले ही लिया मैंने उसे
तुम बताओ रूबरू महताब कब तक देखता
एक दिन जाना ही था मुझको दयार-ए-ग़ैर से
मैं ज़माने तेरे आब-ओ-ताब कब तक देखना
-गुलशन मेहरा
