नगर के बीचों बीच एक पुराना पार्क था। कभी वहाँ बच्चों की चहल पहल रहती थी, पर अब वह पार्क बुज़ुर्गों की शाम और कुछ अकेले लोगों की सुबह तक सीमित रह गया था।
उसी पार्क के एक कोने में एक लोहे का बक्सा रखा था। ऊपर सफेद रंग से लिखा था, खुशियों का एटीएम। नीचे एक छोटी सी पर्ची चिपकी थी, यहाँ रुपये नहीं, अपने दुःख जमा कीजिए। बदले में जो मिलेगा, उसे सँभाल कर रखिएगा। लोग पढ़ते, मुस्कुरा देते और आगे बढ़ जाते।
लेकिन एक दिन सत्तर वर्षीय शारदा देवी वहाँ रुकीं। पति को गुज़रे दस वर्ष हो चुके थे। बेटा विदेश में था। बहू वीडियो कॉल पर हालचाल पूछ लेती थी, पर घर की दीवारों से बातें करने की आदत अब भी नहीं छूटी थी। उन्होंने काँपते हाथों से एक कागज़ निकाला और लिखा, मुझे अकेलापन बहुत सताता है। कागज़ बक्से में डाल दिया।
अगले दिन वे फिर पार्क आईं। बक्से के नीचे एक छोटा सा लिफाफा रखा था। उसमें केवल एक पंक्ति लिखी थी, कल शाम पाँच बजे यहीं आइए। शारदा देवी को आश्चर्य हुआ।
अगले दिन वे समय पर पहुँचीं। पार्क में पाँच छह बच्चे बैठे थे। उनके साथ एक युवक था। युवक बोला, मैं रोहित हूँ। पास के अनाथालय में पढ़ाता हूँ। बच्चों को कहानी सुनाने वाली दादी चाहिए थी। आपके बारे में इस एटीएम ने बताया। शारदा देवी हँस पड़ीं। एटीएम ने? रोहित मुस्कुराया। हाँ, यही तो लिखा था आपके कागज़ में। उस दिन उन्होंने बच्चों को पंचतंत्र की कहानी सुनाई। कई महीनों बाद घर लौटते समय उन्हें लगा कि घर की खामोशी थोड़ी कम हो गई है।
धीरे धीरे उस बक्से की चर्चा पूरे शहर में फैल गई। कोई लिखता, बेटा बात नहीं करता। किसी को अगले दिन बेटे का फोन आ जाता। कोई लिखता, मुझे नौकरी नहीं मिल रही। तो किसी अजनबी से नई राह की जानकारी मिल जाती। एक लड़की ने लिखा, मैं असफल हो गई हूँ। उसे जवाब मिला, असफलता जमा हो गई है। आत्मविश्वास निकालने के लिए कल फिर आइए। और सचमुच अगले दिन पार्क में उसे एक सेवानिवृत्त अध्यापक मिले, जिन्होंने उसे फिर से तैयारी शुरू करवाई।
लोग सोचने लगे, आख़िर इस एटीएम को चलाता कौन है।
एक दिन नगर निगम ने घोषणा कर दी, यह सार्वजनिक स्थान पर अवैध ढाँचा है। इसे हटाया जाएगा। अगली सुबह अधिकारी जेसीबी लेकर पहुँच गए। पर वहाँ शहर का आधा हिस्सा खड़ा था।
शारदा देवी आगे बढ़ीं। उन्होंने कहा, साहब, इसे मत हटाइए। अधिकारी बोले, यह कोई बैंक नहीं है। भीड़ से आवाज़ आई, हमें पता है। तो फिर? शारदा देवी ने मुस्कुराकर कहा, यह मशीन नहीं है। यह हमारी आदत है। जब मैंने अकेलापन जमा किया था, मुझे बच्चे मिले थे।
रोहित बोला, जब मैंने माँ को खोने का दुःख जमा किया था, मुझे शारदा दादी मिली थीं। एक रिक्शाचालक बोला, मैंने भूख जमा की थी, लोगों ने खाना बाँटा। एक बच्ची बोली, मैंने डर जमा किया था, सबने हिम्मत दे दी।
अधिकारी चुप हो गए। उन्होंने बक्सा खोला। अंदर न कोई मशीन थी, न तार, न स्क्रीन। बस हजारों छोटी बड़ी पर्चियाँ थीं, दुःखों से भरी हुई। और उनके बीच एक वाक्य लिखा था, जिस दिन लोग एक दूसरे का दर्द सुनना सीख जाएँगे, उसी दिन हर दिल खुशियों का एटीएम बन जाएगा।
अधिकारी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने बक्सा बंद किया और धीरे से कहा, इसे रहने दीजिए।
आज भी वह बक्सा उसी पार्क में रखा है। लोग वहाँ दुःख जमा करते हैं, और बदले में कभी एक मुस्कान, कभी एक मित्र, कभी एक अपनापन, तो कभी जीने की वजह निकाल ले जाते हैं।
क्योंकि सच तो यह है कि, खुशियाँ किसी बैंक में जमा नहीं होतीं। वे बाँटने से बढ़ती हैं, और इंसान का दिल ही उनका सबसे बड़ा एटीएम है।
-डॉ. प्रीति समकित सुराना
