दौलत अपार
मगर, कोई नहीं पास
गरीबी का एहसास
मन करता बेचैन
सच, न मन को चैन
न बची कोई आस
जिंदगी जिंदा – जिंदा
मगर, निराश – हताश
हक – अधिकार की बात
अब लगती बेईमानी
दौलत अपार
मगर, कोई नहीं पास
नजर सबकी
मगर, मौत का इंतजार
काश, दौलत की जगह
संस्कार पर देता ध्यान
गरीबी का एहसास
जलाता नहीं दिमाग
पास अपनों की भीड़
चेहरे पर होती मुस्कान।
-राजेश देशप्रेमी
