गवां कर बैठा हूं

सुख चैन अपना गवां कर बैठा हूं,
रातों की नींद अपनी उड़ा कर बैठा हूं।

कई समय पहले अपने को बनाया था मैंने,
तुम्हारे जाने से अपने को तबाह कर बैठा हूं,

लोग रोकते है मुझे तुम्हारे बारे में सोचने से,
तुम्हारी यादों को ही बस सवार कर बैठा हूं,

बहुत फर्क पड़ता है किसी के न होने से,
तुम्हारे बिना अपने को उजाड़ कर बैठा हूं,

सबसे ज्यादा चाहा था तुझे मैने,
तेरे लिए अपना सब कुछ लुटा कर बैठा हूं,

अब समाज में प्रणव की आबरू क्या है,
तेरे लिए सारे समाज को झुठला कर बैठा हूं।

-प्रणव राज
कैमूर (बिहार)

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