गिला होता ज़माने से मगर इतना नहीं होता,
मेरा ईमान से रिश्ता अगर गहरा नहीं होता।
भले ही कोयले की खान का पत्थर है हीरा भी,
मगर हर एक पत्त्थर खान का हीरा नहीं होता।
न जाने कितने दरिया हैं जो मिलते हैं समंदर से,
ये खारा जल समन्दर का मगर मीठा नहीं होता।
वहाँ सेहरा नज़र आता, जहाँ तक देख पाते हम,
हमारे सोच में कोई अगर दरिया नहीं होता।
भला इस बात पर क्यों रात दिन मैं दिल जलाता हूँ,
किताबोंमें लिखा है जो, कभी वैसा नहीं होता।
हवा में भाप बन कर ही समा जाता है सब पानी,
इसे जितना उबालो ये कभी गाढ़ा नहीं होता।
-अशोक रावत
