गुज़रे वक्त से अब, क्या कहें हम
फ़ना होना है अब तो, क्या कहें हम
बड़ी यादें, सफ़र भी मुख़्तसर है
तुम्हें मालूम है सब, क्या कहें हम
जरा नज़दीक आओ, यूं ही बैठो
भला नाराज़ हो अब, क्या कहें हम
बची हैं चंद सांसें अब तो यारो
करो कुछ गुफ्तगू, अब क्या कहें हम
रहो महफूज़ ‘नायक’, आरज़ू है
मेरा किस्सा ख़तम अब, क्या कहें हम!
-अरविन्द नायक
