“गौरैया की प्यास”
हम इक्कीसवी सदी में जा रहे है
गौरैया दिवस मना रहे है,
पिछड़े थे जब हम
नित्य गोरैया गाती थी,
कलरव मधुर सुना कर
हम सबको जगाती थी,
अब उठने की खातिर
अलार्म रोज लगा रहे है,
हम गौरैया दिवस मना रहे हैं- – – –
नीड अपने बनाने
जँगलों को काट दिया
प्यारे प्यारे गाँवों को
शहरों में बाँट दिया,
कांक्रीट के जँगल उगा रहे है,
हम गौरैया दिवस मना रहे हैं- – – – – – –
बचपन में जब रोते थे
बाबा चूँ चूँ चिडई दिखाते थे
और फुदकते देख उसे
हम कितना मुस्काते थे,
अब मोबाईल में बच्चों को
स्पेरो दिखा रहे हैं,
हम गौरैया दिवस मना रहे है- – – –
आँगन कच्चे रहे नहीं
हुई झाड़ियाँ नाश
धूल कहीं अब रही नहीं
कहाँ दिखाये नाच,
ए. सी. अब लगवाने को
बँद घर करवा रहे है
हम गौरैया दिवस मना रहे है – – – – –
आसमाँ की ख्वाहिश में
नीचे ज़मी छूट गई
जाने अनजाने ही हम से
गौरैया भी रूठ गई,
बस अब “दिवस” मना कर
दिल को बहला रहे हैं
हम इक्कीसवी सदी में जा रहे है।
-कीर्ति प्रदीप वर्मा
