आज हम ऐसे समय में सांस ले रहे हैं जहां नैसर्गिकता का स्थान कृत्रिमता ने ले लिया है, चाहे वह वातावरण की हो, खान-पान की हो ,विचारों की हो अथवा रिश्तों की। यहां तक की बुद्धिमत्ता भी कृत्रिम हो गई है ,आज इतना पॉल्यूशन हो गया है कि हम घरों के अंदर एसी कमरों में रहने को मजबूर हो गए हैं, यही बात हमारे खान-पान पर भी लागू होती है भोजन पदार्थों के उत्पादन में जहरीले फर्टिलाइजर का खूब प्रयोग होता है , दूध को अमृत का दर्जा दिया जाता है उसमें भी मिलावट की बातें सामने आती है। यह बातें हमारे तन पर तो असर डालती ही है मन पर भी असर डालती हैं। जब भी हम समाचार सुनते हैं तो कहीं हत्या, चोरी ,डकैती के समाचार होते हैं कहीं खान-पान में मिलावट के ।हमारी संस्कृति में कहां गया है जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन।आयुर्वेद भी खाना खाने को मन के भावों से जोड़कर देखता है। अधर्म ,चोरी या बेईमानी के पैसों से खरीदा हुआ अन्न मन पर विपरीत प्रभाव डालता है। महाभारत में भीष्म ने भी कहा है क्योंकि उन्होंने दुर्योधन का भोजन ग्रहण किया था इसलिए वे द्रोपदी के चीर हरण पर मौन रहे और अधर्म कर बैठे। कहने का अर्थ है चारों ओर मिलावट और बेईमानी का बोलबाला है इसीलिए लोगों के मन से संस्कारों का विलोप हो रहा है ।रही सही कसर सोशल मीडिया पूरी कर देता है ।रिश्ते तो विशेषतः दूषित हो गए हैं चाहे वह खून के रिश्ते हो या स्त्री पुरुष संबंध। हमारी संस्कृति में मित्रता के रिश्ते को सबसे ऊपर स्थान दिया गया है चाहे वह कृष्णा और सुदामा की मित्रता हो या कर्ण और दुर्योधन की ।दुर्योधन का हारना तय होने पर भी कर्ण आजीवन उनके साथ खड़े रहे इससे बड़ा मित्रता का उदाहरण और क्या हो सकता है, लेकिन आज यह रिश्ता इतना बेमानी हो गया है कि गर्त में जाता नजर आता है। बीती 28 मई को मित्रता शब्द उसे वक्त शर्मसार हुआ जब एक दोस्त सूर्या को दूसरा दोस्तअसद कुर्बानी दिखाने के बहाने घर से बुलाकर ले गया और घेर कर उसे बहुत वीभत्स तरीके से मार डाला, इनकी उम्र 17 साल बताई जाती है, विचारणीय है कि ऐसा करते समय उसकी संवेदनाएं नहीं जागी दूसरा उदाहरण भी 30मई का ही है जब एक 24 साल के होनहार युवक की हत्या भी उसी के दोस्त ने कर दी । कहीं कहीं तो माता पिता और संतान के संबंध भी संवेदना विहीन होते दिखाई देते हैं।ऐसे समाचार हमें आईना दिखाते हैं कि मानव में मानवता समाप्त हो रही है ,हम कैसे समाज में जी रहे हैं। क्या आपस में अनबन होने का अर्थ है कि उसकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी जाए। आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को शुरू से ही अच्छे संस्कार दिए जाएं ,उन्हें मानवता का अर्थ समझाया जाए, रिश्तो की गरिमा के विषय में बताया जाए ,अपनी संस्कृति से रूबरू करवाया जाए ।यह कार्य हम सबको मिलकर समय रहते करना होगा नहीं तो समाज का खात्मा होने में वक्त नहीं लगेगा
-अनुपमा शर्मा,
रुड़की
