दौलत के तराजू में
न जाने क्यूं – क्यूं
हमेशा नीचे रहा
लोगों की नजरों में
नकारा – बुद्धिहीन
मगर, न जाने क्यूं
कभी बेचैन नहीं रहा
जरूरत भर आमद
और चैन की जिंदगी
बुद्धि पर लोग तरस खा
गाते मूर्खता के गीत
मगर, न जाने क्यूं
मन में धनलिप्सा
कभी जगी ही नहीं
न हुआ अफसोस
हां, नजरों के सामने
हाय ! हाय ! करते लोगों को
आह ! आह ! करते देखा जरूर
सच, संतोष – संयम में ही
खुशहाली – हरियाली।
-राजेश देशप्रेमी
