गहरी काली रात थी। चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था। सारा शहर सन्नाटे की चादर ओढ़ कर सो रहा था। सड़क पर कहीं-कहीं रोशनी थी, वह भी सड़क किनारे आने वाले खंभों पर टंगी माध्यम रोशनी वाले बल्बों की। जिसमें कुछ देख पाना मुश्किल था। आसमान में बादल छाए थे। बरसात की वह रात। कभी भी बारिश हो सकती थी। हल्की-हल्की पर ठंडी हवाएं चल रही थी। हल्की हवाएं जब पेड़ों के पत्तों से टकराती तो सन्नाटा भंग हो जाता और वापस एक चुप्पी सी छा जाती। शहर में थोड़ी दूर पर एक छोटा सा घर था। कच्ची मिट्टी का वह घर, जिसकी दीवारें कभी भी ढह सकती थी। बस एक तूफानी बारिश की ही कमी थी। उसी झोपड़ी में एक परिवार रहता था। पिता, पुत्र और उसकी मां। पिता कुछ काम से बाहर गए थे और झोपड़ी में बस मां और बेटा ही थे।
“पिताजी, कब आएंगे, मां?” बेटे ने एक सुखी और कठोर रोटी को तोड़ते हुए पूछा।
“बस, आते ही होंगे।” मां ने कहा। मां एक बुझते हुए चूल्हे के पास बैठी हुई थी, उसके हाथ में माचिस की एक पुरानी सी डिब्बी थी। वह आग जलाने की कोशिश कर रही थी। पर, नमी के कारण माचिस की तिल्ली आग उत्पन्न करने में असमर्थ हो जा रही थी।
तभी बच्चे ने मां को पुकारा। “मां, देखो हल्की बूंदा बांदी होने लगी” बच्चे ने एक हाथ से रोटी का बर्तन पड़ा हुआ था और एक हाथ बाहर निकले आसमान से टपकती बूंद को स्पर्श कर रहा था।
“पिताजी कहीं भीग तो नहीं जाएंगे, न?” बच्चे ने हाथ अंदर कर पूछा। चिंता की लकीरें उसके माथे पर साफ-साफ नजर आ रही थी।
“नहीं” मां ने एक छोटे से दरवाजे के बाहर देखते हुए धीमे स्वर में कहा।
तभी हल्की बूंदा बांदी तेज बारिश में बदल गई हल्की हवाएं जोरदार आंधी का रूप ले लेती हैं। पेड़ के पत्ते जो हल्की हवाओं के कारण एक संगीत उत्पन्न कर रहे थे, वह अब पेड़ से अलग होने लगे थे। बारिश तेज होने लगी। मां ने झट से माचिस का डब्बा जमीन पर फेंका और अपने बच्चे को सीने से लगा लिया। वह घर ज्यादा झेल नहीं सकता था, यह बात मां को पता थी। अपने पति की राह देखती और बच्चे को सीने से लगाए कभी बाहर तो कभी छत की ओर देखती रहती थी।
“मां, पिताजी कब आएंगे?” बच्चे ने सिसकते हुए पूछा। फिर उसी सवाल का जवाब देने के लिए मां ने एक गहरी सांस ली और कहा “आ जाएंगे बेटा, किसी दुकान में ठहरे होंगे, बारिश से बचने के लिए।”
फिर झोपड़ी में एक चुप्पी फैल गई। बच्चा सिसक भी नहीं रहा था। शायद, मां की बात ने उसके अंदर पिता को लेकर सारे सवाल खत्म कर दिए थे। तभी हवा का एक ऐसा झोंका आया कि पूरा घर कांप उठा हो। घर का पीछे का हिस्सा ढह चुका था। अब आधे घर में ही मां और बेटे थे। दोनों देखना चाहते थे कि क्या हुआ। पर बादलों की भयानक गर्जन के कारण वह एक दूसरे से गोंद की तरह चिपके रहे। इसी तरह उनकी आंख लग गई। बरसात अभी थमी नहीं थी पर आंधी कम हो गई थी। बच्चे की आंखें धीरे-धीरे खुली, इस उम्मीद में कि शायद तूफान थम गया हो। बच्चे ने पेट के बल लेते-लेते धीरे से अपनी मां को देखा जो अभी भी उसे पकड़ी हुई थी। सो रही थी। आसपास अभी भी भयंकर बारिश हो रही थी। झोपड़ी की आधी छत ढह चुकी थी। बच्चा अभी भी हैरान था, क्योंकि इतनी बारिश में भी वह बिल्कुल सूखा था। उसने जब अपनी गर्दन मोडी तो वह हैरान हो गया। उसके पिता उसकी तरफ अपनी पीठ किए बैठे थे। उनका पूरा शरीर भीगा हुआ था। आसपास तो बारिश हो रही थी पर उस बच्चे के लिए बारिश की एक बूंद भी नहीं टपक रही थी।
-प्रणव राज
